तेलुगू प्रोड्यूसर्स काउंसिल ने जुलाई के आखिरी दिनों में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि वह अपनी फिल्मों की शूटिंग रोकने जा रहे हैं. चूंकि फिल्में चल नहीं रहीं, बॉक्स ऑफिस की कमाई गिरती जा रही है. फिल्म बनाने का खर्च बढ़ गया है, इसलिए शूटिंग नहीं होगी. इसके बाद अगस्त के पूरे महीने में तेलुगू फिल्मों की शूटिंग बंद रही. हालांकि एक महीने बाद 1 सितंबर से दोबारा शूटिंग शुरू हो गई. यह हैरान कर देने वाली घोषणा थी. मगर चंद महीने बाद ही इससे अलग लेकिन एक और महत्वपूर्ण ऐलान दक्षिण भारतीय सिनेमा इंडस्ट्री से आया. इस बार तमिल फिल्म प्रोड्यूसर्स सामने आए और कहा कि वे चाहते हैं कि फिल्मों के रिलीज होने के तीन दिन बाद उसका रिव्यू यानी समीक्षा हो. दलील ये दी गई कि रिलीज होने से पहले समीक्षा होने से फिल्में चल नहीं पातीं. लोग फिल्मों के बारे में गलत धारणा बना लेते हैं. इन बयानों या घोषणाओं के भीतर झांक कर देखें तो साफ नजर आएगा कि फिल्मों के फ्लॉप होने का डर सिर्फ बॉलीवुड को ही नहीं, साउथ की सिनेमा को भी सता रहा है.
दरअसल, तमिल फिल्म प्रोड्यूसर्स काउंसिल ने फिल्म रिलीज होने के बाद रिव्यू का प्रस्ताव रखा है, उसके पीछे निर्माताओं का तर्क है कि फिल्म के रिलीज होते ही मीडिया या सोशल मीडिया फिल्मों के बारे में ‘सोची-समझी धारणा’ बना लेते हैं. यह फिल्म बेकार है, कहानी कमजोर है, विदेशी फिल्म का रिमेक है या और भी बहुत कुछ. इन्हीं धारणाओं से दर्शक वाकिफ होते हैं और फिल्म की कमाई प्रभावित होती है. कई फिल्में इसका खामियाजा उठाती हैं, फ्लॉप हो जाती हैं. फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों को इसी ‘धारणा’ से बचाकर रिलीज होने के बाद समीक्षा के लिए भेजना चाहते हैं. इतना ही नहीं, काउंसिल ने यह भी कहा कि जो फिल्में रिलीज होने वाली हैं उसके कलाकार मीडिया को इंटरव्यू न दें. क्योंकि मीडिया कलाकारों की बातचीत को तोड़-मरोड़कर पेश करता है और फेक-न्यूज बनाकर फैलाता है. इससे भी फिल्मों के प्रदर्शन पर असर पड़ता है. फिल्मों का न चलना कितना खल रहा है और कितना गंभीर विषय है, यह प्रोड्यूसर्स काउंसिल के एक और आग्रह से पता चलता है. काउंसिल ने थियेटर मालिकों से आग्रह किया है कि वे फिल्मों के ‘फर्स्ट-डे, फर्स्ट-शो’ जैसे पब्लिक रिव्यू लेने वाले यूट्यूबर्स को सिनेमाहॉल या मल्टीप्लेक्स में आने की अनुमति न दें. फिल्म देखकर निकले दर्शकों के रिव्यू भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.
मुंबई से चेन्नई तक फ्लॉप का डर
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हम जिसे साउथ का सिनेमा कहते हैं, उसमें सिर्फ एक भाषा की फिल्में ही शामिल नहीं हैं. तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम भाषा में इस साल सैकड़ों की तादाद में फिल्में बनी हैं. मगर देशभर में चर्चा हुई इनमें से दो-चार गिनती की फिल्मों की. RRR मूल रूप से तेलुगू में बनी, हिंदी समेत अन्य कई भाषाओं में रिलीज हुई, सुपर-डुपर हिट भी हुई. मगर क्या इसकी ही तरह मलयालम की कोई फिल्म RRR जैसी बन पाई? KGF कन्नड़ भाषा की फिल्म है, जिसने देशभर में कई भाषाओं में डब होकर भी शानदार बिजनेस किया. तो क्या कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की दूसरी फिल्में भी केजीएफ की तरह ही चलीं? इन सवालों का जवाब है नहीं. दरअसल, कोविड-काल के बाद फिल्मों के न चलने या फ्लॉप साबित होने की दर बढ़ गई है. ओटीटी या किन्हीं और वजहों से दर्शक उस तादाद में हॉल तक नहीं पहुंच रहे, जो पहले देखा जाता रहा है. फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर सफल न होने या उनकी कमाई लगातार कम होने का डर सिर्फ बॉलीवुड का नहीं है, बल्कि साउथ के फिल्म निर्माता भी इसी डर का सामना कर रहे हैं.
मुंबई से चेन्नई तक फ्लॉप का डर
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FIRST PUBLISHED : September 19, 2022, 21:35 IST





