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National Cinema Day: रहे सलामत, सिनेमा और समोसा | – News in Hindi – हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी


बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा… सिनेमा और समोसे का साथ दशकों तक ऐसा ही था. साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाला, एकदम फिल्मी टाइप का. इनके दोस्ताने की ही बदौलत सौ-पचास में दो जन बड़े मजे से महीने में एकाध फिल्म तो निपटा ही देते थे और वो भी हरी-लाल चटनी में लिपटे दो-दो समोसों के साथ. फिर जैसे-जैसे नई सहस्राब्दी करीब आयी तो फिल्मों में इंटरनेशनल-एनआरआई फील आने लगा.

धीरे-धीरे समोसे की जगह इटली, मैक्सिकन और स्पेन से आए स्नैक्स लेते गए. कविता, कमल, मीनाक्षी की जगह सिनेमाघरों के नाम गैलेक्सी, स्टार वन और सिने नाइट पड़ गए और सौ-पचास का सिनेमा इतना महंगा हो गया कि 200 दे दो या 300, टिकट खिड़की से बकाया पैसे वापस मिलने लगभग बंद से हो गए. बदलते दौर में बिना बेफवाई किए, सिनेमा और समोसा एक-दूजे से दूर होते चले गए. यहां परीक्षित साहनी पर फिल्म पवित्र पापी (1970) में फिल्माया गया एक गीत ‘तेरी दुनिया से होके मजबूर चला, मैं बहुत दूर बहुत दूर चला…’ सिचुएशन को समझने में मददगार लगता है.

खैर, अब फ्लैशबैक में इतना भी डीप जाने क्या फायदा? पर क्या किया जाए, नेशनल सिनेमा डे के जरिए अतीत का एक आकर्षण फिर से जी उठा. समोसे के साथ सिनेमा से जुड़ी यादें फिर से ताजा हो गईं. बरसों बाद टिकट खिड़की से पैसे जो वापस मिले थे. टिकट दर भी ट्रिपल से डबल डिजिट में थी. यह पहला मौका था, जब वेलेंटाइन डे, मदर्स-फादर्स डे की ही तरह नेशनल सिनेमा डे, देशभर में मनाया गया. मल्टीप्लेक्स संगठन की अपील पर सिनेप्रेमी भारी संख्या में पूरे जोर शोर से इस दिन को मनाने पहुंचे. संगठन का उद्देश्य था कि लोग पहले की तरह सिनेमाघरों का रुख करने लगें. सौगात के रूप में मात्र 75 रुपए में फिल्म की टिकट का ऑफर भी दिया गया.

यहां अच्छी बात यह रही कि भले एक दिन के लिए सही टिकट दर कम करके मल्टीप्लेक्स बिरादरी ने अपने दर्शकों को धन्यवाद दिया, तो उधर दर्शकों ने भी लाखों की संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर ये जता दिया कि सिनेमा से दूरी उनके मनचाही नहीं, बल्कि कुछ कारणों से है. सिनेमाघरों पर टंगे हाउसफुल के बोर्ड बता रहे थे कि दर्शक और प्रदर्शक के बीच यह संवाद कामयाब रहा, जबकि इस खास दिन को खास बनाने में फिल्म बिरादरी का योगदान शून्य नजर आया.

जनता बोली, ये दिल मांगे और

राष्ट्रीय सिनेमा दिवस के जरिए किसने क्या पाया क्या नहीं, इसका विश्‍लेषण होता रहेगा. लेकिन इतना जरूर है कि प्रदर्शकों और दर्शकों का दिल इस एक दिन के इवेंट से नहीं भरा होगा. दर्शकों ने इस दिन के प्रति इतना जबरदस्त उत्साह दिखाया कि सिनेमा मालिकों को शोज बढ़ाने पड़ गए. भला कौन विश्वास करेगा कि इस दौर में जब बड़े से बड़े स्टार की फिल्में फ्लॉप हो रही हैं, वहां लोग सुबह 6 बजे के शो की लाइन में लगे थे. हालांकि इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि कौन किसकी फिल्म देखने गया और सस्ती टिकट दर का सबसे ज्यादा फायदा किस फिल्म को मिला.

सिनेमाघरों के बाहर लगी कतारें बता रही हैं कि लोगों में सिनेमा की दीवानगी उसी पुरानी हद तक आज भी बरकरार है. दर्शकों का उत्साह इससे भी झलकता है कि नेशनल सिनेमा डे की तारीख 16 सितंबर के बजाए 23 सितंबर किए जाने के बावजूद करीब 80 से 90 फीसदी टिकटों की बुकिंग पहले की जा चुकी थी। फिर चाहे शो सुबह 6 बजे का हो या रात 12 बजे का.

मजे की बात है कि इस खास दिन को लेकर सोशल मीडिया पर बस जरा मरा सी ही हलचल थी। फिल्म ट्रेड पर लिखने वाले कुछ पत्रकार, फिल्म समीक्षक, वितरक-प्रदर्शकों के खातों से थोड़े बहुत उत्सावर्धन करते ट्वीट जरूर थे. कोई हैशटैग नहीं, कोई ट्रेंड नहीं और न ही किसी किस्म का खास प्रचार. जो कुछ खबर फैली वो बस मुंह जुबानी. बावजूद इसके करीब 65 लाख लोगों (संगठन द्वारा जारी आंकड़ा) ने इस एक दिन में 75 रु. की टिकट दर चुकाकर 4 हजार से अधिक स्क्रीन्स पर सिनेमा देख डाला. जरा सोचिए कि अगर इस मुहिम में बाकियों के साथ तेलांगना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य भी शामिल हो पाते तो दर्शकों की संख्या करोंड़ों तक जा सकती थी. कुछ कर संबंधी नियमों के चलते ये राज्य उत्सव में शिरकत नहीं कर पाए.

सिनेमा को समर्पित एक दिन और वो भी इतनी कम कीमत की टिकट दर पर. जरा सोचकर देखिए कि ऐसी किसी किफायती ऑफर पर एक समान्य उपभोक्ता की प्रतिक्रया कैसी होती है. एक दिन की सेल के अंतिम पलों में भी जब आप कुछ खरीदने से चूक जाते हैं तो मलाल होना लाजिमी है लेकिन जब सेल का माल हत्थे लग जाए तो खुद को मालामाल समझते हैं.

इस एक खास दिन के ऑफर ने न जाने कितने सिने रसियाओं को कुछ ऐसा ही अहसास कराया होगा. खासकर रोज के सौ-दो सौ कमाने वाले को अगर मल्टीप्लेक्स में 75 की टिकट और 25 का समोसा, यानी कुल जमा सौ में सिनेमा के साथ-साथ स्नैक्स का भी सुख मिल जाए तो मालामाल की ही फीलिंग आएगी.

कहा नहीं जा सकता कि यह अहसास कितनी देर तक टिक पाएगा. सेल होती तो अगले सीजन में फिर लौट जाती. पर जन्मदिन की तरह इस टाइप के ‘डे’, तो साल में एक ही बार आते है. हालांकि यहां बात बात में जोड़ तोड़ का खयाल रखने वाली उस आम जनता के नजरिए से ही न सोचकर अगर इस मुहिम को एक मुक्कमल उजली तस्वीर के तौर पर देखना चाहें तो एक दिन के बजाए थोड़े लंबे समय के लिए टिकट दर कम करके असली रेस्पोंस को परख सकते हैं. यह देख सकते हैं पचहत्तर रु. न सही, सौ-सवा सौ रु. या दो सौ के दायरे में कीमत रखने से कैसा असर पड़ेगा. ऐसा करके शायद एक बहुत बड़ा वर्ग सिनेमाघरों से फिर से जुड़ सकेगा. खासतौर से 4-5 सदस्यों वाले ऐसे मध्यम वर्गीय परिवार, जिन्होंने पंद्रह सौ -दो हजार बचाने खातिर न जाने कब से एक साथ सिनेमा नहीं देखा है.

अब एक दिन में 65 लाख लोगों की भागीदारी का असर दिखना तो चाहिए. बेशक एक दिन के लिए ही सही, दर्शकों से लबालब भरे सिनेमाघरों को देखकर दिल तो बहुतेरों के गदगद हुए ही हैं. और शायद इसीलिए यह सुगबुगाहट है कि क्यों न कुछ दिनों के लिए टिकटों के रेट कम करके देखें जाएं. आने वाले दिनों में नोटिस करेंगे तो पाएंगे कि टिकट दरें कम तो हुई हैं. आधी कीमत न सही, पर जो टिकट पहले दो सौ या ढाई सौ में थी, अब सवा सौ रु में मिल जाए, तो मतलब साफ है कि फर्क पडा है. इस बीच एक नई मल्टीप्लेक्स श्रृंखला ने बाकायादा अपने सोशल मीडिया पर यह ऐलान करके कि उनके कुछ स्क्रीन्स पर टिकट दर 70 से 100 रुपए होगी, से यह बहस और तेज हो गई है. इस दौरान एडवांस बुकिंग जांचने पर पता चला कि न केवल बीते वीकेंड, बल्कि करीब एक हफ्ते तक अधिकतर जगह टिकट दरें दो सौ से नीचे या इसके आस-पास ही हैं. सिनेमा प्रदर्शक चाहें तो एक दिन के सालाना इवेंट के बजाए सीजनल सेल का ऑप्शन चुन सकते हैं, क्योंकि सिनेमा को लेकर एक दर्शक का दिल किसी मासूम बच्चे की तरह मचल सकता है और जो कोलड्रिंक देखकर बार-बार कहता है ये दिल मांगे और, और, और…

कंटेंट या कीमत, कौन किस पर हावी?

बीते कई महीनों से यही सुनने को मिल रहा है कि बॉलीवुड फिल्मों का कंटेंट बहुत खराब है. इस कारण फिल्में नहीं चल रही हैं, जिससे न केवल पूरी इंडस्ट्री का बिजनेस प्रभावित हो रहा है बल्कि सिनेमाघर मालिकों सहित वितरकों और प्रदर्शकों को भी नुकसान हो रहा है.

हां, ये सही है कि बॉलीवुड को न केवल अपने कंटेंट, बल्कि अपने स्टार सिस्टम सहित कई बातों पर सोच-विचार की जरूरत है. लेकिन यह पूरा सच नहीं है. कंटेंट एकमात्र कारण नहीं है इंडस्ट्री की खस्ता हालत का, कई अन्य कारण भी हैं. लेकिन आज यह बहस का मुद्दा नहीं है. क्योंकि केवल कंटेंट ही मुद्दा होता तो इस एक खास दिन में लोग केवल अच्छे कंटेंट की ही फिल्म देखते आते, जबकि इस दिन सबसे बंपर कमाई की रणबीर-आलिया की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ ने. अपने विजुअल इफेक्ट्स और थीम के लिए सराही जा रही इस फिल्म को समक्षकों से मिलीजुली प्रतिक्रिया ही प्राप्त हुई है और फिल्म को लेकर व्यापक रूप से बॉयकाट मुहिम भी चलाई गई, बावजूद इसके नेशनल सिनेमा डे से पहले ही, यह 360 करोड़ रुपए (वर्ल्डवाइड ग्रॉस) से अधिक बटोर चुकी थी.

इस खास दिन पर रेट घटाने का फायदा यह हुआ कि फिल्म के खाते में शुक्रवार को करीब 10 करोड़ और शनिवार को 5-6 करोड़ और जुड़ गए. फिल्म अच्छी है या खराब, इस पर मंथन करने वाले सिर धुनते रहें, पर सच यह है कि इस एक दिन में 85 फीसदी ऑक्यूपेंसी के साथ करीब 14 लाख लोगों (केवल तीन मल्टीप्लेक्स चेन का आंकड़ा ) ने यही फिल्म देखी. इस एक खास दिन से फिल्म की कमाई का उछाल 250 फीसदी से ऊपर चला गया जो कि कई दिनों से माइनस में चल रहा था. अब यह फिल्म 400 करोड़ के ग्रॉस कलेक्शन के काफी पास पहुंच गई है.

हां, ये जरूर है कि रियायती दर के साथ दर्शकों को 2 डी (साधारण परदा) के अलावा 3डी और आईमैक्स 3डी फॉरमैट में ‘ब्रह्मास्‍त्र’, देखने में एक अलग ही मजा आया होगा. क्योंकि 2 डी के मुकाबले अन्य फॉरमेट की टिकटें काफी महंगी होती हैं. कंटेंट और कीमत की परीक्षा में सनी देओल की ताजा रिलीज ‘चुपः रिवेंज ऑफ दि आर्टिस्ट’ को भी तोलकर देखना चाहिए, जिसे इस खास दिन 3 करोड़ और अगले दिन 2 करोड़ रुपए का कलेक्शन प्राप्त हुआ. आर. बाल्की निर्देशित इस फिल्म को 1000 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया और बताया जाता है कि पहले दिन करीब 4 लाख लोगों ने इसके टिकट खरीदे. इस लिहाज से सनी देओल की इस फिल्म को एक अच्छी ओपनिंग माना जा रहा है. सनी देओल शुरू से ही सीटीमार जनता के हीरो रहे हैं. उनकी फिल्म की टिकट दर सामान्य रहे और दो-तीन हजार स्क्रीन्स पर भी रिलीज की जाए तो आज भी शानदार कलेक्शन कर सकती है.

हालांकि अरसा हो गया और अब जाकर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी फिल्म का कंटेंट कैसा है. सनी को उनके फैंस पसंद करते हैं तो मतलब पसंद करते हैं. बेशक उनकी संख्या जो हो. इसके लिए कारण नहीं चाहिए और अब जाकर कंटेंट तो कतई नहीं. उनकी इस फिल्म का न तो खास प्रचार किया गया था और न ही पैकेजिंग उनके मिजाज की थी. फिर भी इस फिल्म की बात हो रही है.

रिस्पॉन्स के मामले में इसी के साथ रिलीज हुई आर. माधवन की फिल्म ‘धोखाः राउंड दि कॉर्नर’, खराब प्रतिक्रियाओं के बावजूद 1.15 करोड़ रुपए बटोर ले गई. आसार हैं कि वीकेंड के बाद यह आंकड़ा 2 या 3 करोड़ में बदल जाए. हालांकि यह फिल्म किसी भी रूप में माधवन की अदाकारी और उनकी सिनेमाई छवि के आस-पास भी नहीं फटकती. फिर भी लोग इसे देखने को उमड़े. सस्ती दर नहीं होती तो 50 लाख बटोरने भी भारी पड़ जाते. इसके विपरीत जेम्स कैमरून की विज्ञान-फंतासी फिल्म ‘अवतार’ (2009) को फिर से रिलीज किया गया, जिसने 1-2 करोड़ का कारोबार कर डाला. जरा सोचिए 13 साल पुरानी एक अंग्रेजी फिल्म जिसे लोग 3डी और आईमैक्स पर देखना चाहते होंगे, के लिए स्क्रीन्स ही नहीं बचे। क्योंकि ज्यादातर स्क्रीन्स पर ‘ब्रह्मास्‍त्र’ का कब्जा था.

खैर, कंटेंट और कीमत के इस द्वंद में किस खिलाड़ी में कौन से सुधार या संशोधन की जरूरत है इसका आकलन थोड़े समय बाद किया जा सकेगा. पर यह देखना होगा कि ऐसे प्रयोग क्या आगे भी किए जा सकते हैं. क्या तेलांगना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की भागीदारी इस मौके को और अधिक सार्थक बना सकती थी. क्योंकि इन राज्यों के भाग न लेने से करीब 50 फीसदी सिनेमाघर इस उत्सव में शामिल होने से चूक गए. हालांकि इससे मोटे तौर पर एक जो सूरत उभरकर सामने आ रही है, वो यह है कि सिनेमा टिकटों की दरें कम करने का प्रभाव तो अवश्य ही पड़ेगा.

जाहिर है अगर इसी अनुपात में सिनेमा कैंटीन में मिलने वाले स्नैक्स की दरें भी सोच-समझकर रखी जाएं तो नाचोज और पिज्जा के साथ समोसे को भी मुस्कुराने का मौका मिल सकता है. हालांकि आज भी कई थिएटरों में सिनेमा और समोसे का साथ बरकरार है. दिल्ली के डिलाइट सिनेमाहाल में बर्गर, नाचोज और अन्य स्नैक्स के बीच महासमोसा आज भी पूरी ठसक के साथ लाइन लगाकर से बिकता है. सिनेमा और समोसे का साथ बना रहे, इसके लिए पूरी सिने बिरादरी को साथ मिलकर सोचना होगा.

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