बात 1958 की है. राजनीतिज्ञ और फिल्मकार एमजी रामचन्द्रन, लेखक कल्कि कृष्णमूर्ति से एक ऐतिहासिक तमिल उपन्यास ‘पोन्नियन सेल्वन’ के फिल्म रूपांतरण के अधिकार खरीदते हैं. इसके लिए लेखक को 10,000 रुपए का भुगतान किया जाता है. मुद्रा स्फीति का केलकुलेशन करें तो 2020 में यह राशि बढ़कर 8 लाख 10 हजार होगी. फिल्म में जैमिनी गणेशन और वैजयंतीमाला को कास्ट किया जाता है. शूटिंग शुरू हो, इसके पहले ही एमजीआर का एक्सीडेंट हो जाता है. उन्हें उबरने में छह महीने लगते हैं. एक बार फिर फिल्म निर्माण के अधिकारों का नवीनीकरण किया जाता है और चार साल बाद फिल्म निर्माण शुरू होता है. लेकिन इसे जारी नहीं रखा जा पाता, किन्हीं कारणों से फिल्म फिर अटक जाती है.
चालीस साल गुजर जाते हैं अब आता है 1994. मशहूर फिल्मकार मणिरत्नम एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘इस उपन्यास पर फिल्म निर्माण मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है.’ प्रोजेक्ट में एंट्री होती है दक्षिण के दूसरे लीजेंड फिल्मकार-अभिनेता कमल हासन की, या यूं कहें उनकी एंट्री पहले ही हो चुकी है. वो पहले ही इस उपन्यास के अधिकार खरीद चुके थे. मणि और हासन मिलकर फर्स्ट ड्राफ्ट पर काम शुरू करते है. गाड़ी आगे बढ़ती है, पैसों का गुणा-भाग लगाया जाता है. यह क्या? ये फिल्म तो फाईनेंसियल वाइबल ही नहीं है. सो योजना को फिर पलीता लग जाता है.
मणिरत्नम के जेहन से उनका यह ड्रीम प्रोजेक्ट निकल ही नहीं पा रहा था. सो 2010 के अंत में ‘पोन्नियन सेल्वन’ के निर्माण को सिरे चढ़ाने के प्रयास एक बार फिर शुरू होते हैं. लेखक जयमोहन के साथ स्क्रिप्ट पर काम शुरू होता है. 100 करोड़ का बजट निर्धारित किया जाता है. बड़े प्रोडक्शन के साथ मिलकर फिल्म करने का विचार बनता है. संगीतकार एआर रहमान, सिनेमेटोग्राफर संतोष सिवन, अभिनेता विजय और महेश बाबू जैसे बड़े नाम फिल्म से जोड़े जाते हैं. प्रियंका चौपड़ा और अनुष्का रेड्डी के नाम भी फिजाओं में लहराते हैं. लेकिन फिल्म फिर रूक जाती है. इस बार कारण बनता है मैसूर पैलेस, ललिता महल सहित तमिलनाडु के मंदिरों में शूटिंग की अनुमति नहीं मिलना.
मणि के दिमाग में फिल्म अभी भी चहलकदमी कर रही है. 2019 में एक बार फिर फिल्म बनाने के प्रयास शुरू होते हैं. इस बार रत्नम को लाईका प्रोडक्शन का साथ मिलता है. तमाम उतार-चढ़ाव और अदला-बदली के बाद साउथ के एक्टर विक्रम, ऐश्वर्या राय बच्चन, प्रकाश राज, जयम रवि, ट्रिशा और ऐश्वर्या लक्ष्मी फाइनल किए जाते हैं. आसानी से तो नहीं लेकिन हां, मुश्किल से ही सही इस बाल बेल सिरे चढ़ जाती है. होता ये है कि कोविड-19 की महामारी के चलते दो बार फिल्म निर्माण में बाधा आती है. अंतत: फिल्म को देश भर के अलग-अलग स्थानों पर और थाईलैण्ड (कुछ हिस्सा) में शूट किया जाता है.
प्राब्लम जारी हैं. हैदराबाद में शूटिंग के दौरान एक घोड़े की मौत हो जाती है. इस संबंध में फिल्मकारों को मुकदमे का सामना भी करना पड़ता है. पशु क्रूरता अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत रत्नम, उनके प्रोडक्शन हाउस मद्रास टॉकीज और घोड़े के मालिक के खिलाफ शिकायत दर्ज की जाती है. ‘पेटा’ की ओर से कहा जाता है कि सीजीआई जैसी टैक्नॉलाजी उपलब्ध होने के बावजूद थके हुए घोड़ों को युद्ध में खेलने के लिए छोड़ना बर्बरता है.
शूटिंग रूकती है, चलती है, फिर रूकती है, फिर शुरू होती है. लेकिन अंतत: फिल्म बन ही जाती है. 1958 में पहली बार फिल्म निर्माण की शुरूआत करने के बाद फिल्म को 2022 में थिएटर में जाने का सौभाग्य प्राप्त हो ही जाता है. जो फिल्म लगभग 64 वर्षों में नहीं बन पाई वो जब बनी तो इतनी लंबी हो गई कि इसे दो भागों में विभाजित करना पड़ा. दोनों भागों का कुल बजट 500 करोड़ पाया गया. अब पहला भाग ‘पोन्नियन सेल्वन-1’ यानि ‘पीएस-1’ शुक्रवार 30 सितंबर को रिलीज हुई.
मुसीबतें फिल्म का साथ अभी भी छोड़ने को तैयार नहीं हैं. अब कनाडा में रहने वाले कुछ स्थानीय समूहों ने फिल्म को कनाडा में रिलीज़ न करने की चेतावनी देते हुए कहा है कि इसे रिलीज़ किया तो ‘सिल्वर स्क्रीन’ को ‘टुकड़े स्क्रीन्स’ में तब्दील कर दिया जाएगा. खुशी की बात इतनी है कि देश में इसे लेकर कोई नाराजी नहीं है और दर्शक इसके स्वागत को तैयार हैं. रिस्पांस कितना और कैसा मिलता है ये शुक्रवार को पता चलेगा. यह मूल तमिल फिल्म हिंदी, कन्नड़, तेलुगु और मलयालम भाषा के डब्ड संस्क्रण में रिलीज़ हो रही है. बता दें फिल्म में स्कोर और साउंडट्रेक रचने का जिम्मा मणिरत्नम के पसंदीदा संगीतकार ए.आर. रहमान के कंधों पर है. साउंड ट्रेक में रहमान रचित छह मूल गीत हैं. सिनेमेटोग्राफी की जिम्मेवारी रवि बर्मन ने उठाई है.
बात उपन्यास की. ‘पोन्नियन सेल्वन’ कल्कि कृष्णमूर्ति द्वारा लिखा गया यह एक मशहूर ऐतिहासिक तमिल उपन्यास है. पांच संस्करणों में लिखा गया यह उपन्यास लगभग 2,250 पृष्ठों में विस्तारित है. यह उपन्यास अरुलमोज्हीवर्मन की कहानी का कहता है. जिन्हें बाद में राजराजा चोला के रूप में पहचाना गया. ये तमिल इतिहास के महान राजाओं में से एक थे जिन्होंने 10 वीं-11वीं शताब्दी में राज किया.
यह हिस्टारिकल फिक्शन सबसे पहले 1950 के दशक के दौरान एक साप्ताहिक पत्रिका में सीरीज़ के रूप में प्रकाशित हुआ. तमिल पत्रिका ‘कल्कि’ में यह लगातार साढ़े तीन बरस (29 अक्टूबर 1950 से 16 मई 1954 तक) तक पाठकों का चहेता बना रहा. यह सीरीज इतनी पापुलर थी कि हर सप्ताह पाठक इसकी अगली कड़ी का इंतजार किया करते थे. यह किताब की शक्ल में 1955 में पांच वाल्यूम में प्रकाशित किया गया. पुराने दौर की इस ऐतिहासिक कहानी को कहने के लिए 2,210 पृष्ठों की जरूरत पड़ी. इस उपन्यास में लेखक ने बहुत से वास्तविक ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को सम्मिलित किया है.
फिल्म बनाना फिल्म क्रिएटर्स और प्रोड्यूर्स के हाथ में है. उसे रिलीज करना और दर्शकों तक पहुंचाना वितरक के हाथ में है. इसके बाद इसका मालिक थिएटर गोअर्स है, दर्शक है. दर्शकों को इससे कोई मतलब नहीं है कि फिल्म बनाने में आपको कितनी परेशानी उठाना पड़ी, कितनी मशक्कत करना पड़ी. वो क्रूर शब्दों में कहता है ‘फिल्म बनाने की खुजली आपको है, आप जानें. हमें तो बस इतना पता है कि फिल्म हमारा मनोरंजन करेगी तभी हम अंटी से पैसे निकालेंगे.’ सो ‘पोन्नियन सेलवन-1’ यानि ‘पीएस-1’ का भविष्य 30 सितम्बर को बॉक्स ऑफिस ही तय करेगा. हम अपनी तरफ से बस इतना ही कह सकते हैं – शुभकामनाएं.
शकील खानफिल्म और कला समीक्षक
फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.
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