हिंदी सिनेमा की चंद बेहतरीन फिल्मों में से एक ‘मुगल-ए-आजम’ लोगों को सिर्फ इसलिए याद नहीं रहती कि वह एक शानदार फिल्म है. बल्कि इसके निर्माता के उस जुनून को भी याद रखा जाता है, जो के. आसिफ ने ‘मुगल-ए-आजम’ बनाते समय दिखाई. यही वजह है कि फिल्म के किरदारों से कहीं ज्यादा मशहूर के. आसिफ की कहानियां हैं. ‘मुगल-ए-आजम’ की 9 साल तक चली शूटिंग, शीशमहल वाला सीन (जिसमें प्यार किया तो डरना क्या… गाना फिल्माया गया), दिलीप कुमार-मधुबाला का वह सीन जिसमें उस्ताद बड़े गुलाम अली खां पार्श्वगायन करते सुने गए, फिल्म की नायिका अनारकली के लिए मधुबाला के सेलेक्शन की कहानी…! तात्पर्य यह कि ऐसे तमाम किस्से हैं, जो एक अद्भुत फिल्म के निर्माण की बारीकियां बयां करते हैं. रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की पिछले हफ्ते रिलीज फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ के निर्देशक आयान मुखर्जी अपनी फिल्म रिलीज करने से पहले दावा किया कि उन्होंने भी इसे पर्दे पर उतारने में 9 साल लगाए हैं. उनकी इस ‘मेहनत’ को देखने पब्लिक शुक्रवार को थियेटरों में गई, मगर पहली नजर में ही आयान की उम्मीदों को कमतर ही नहीं, निरर्थक करार दे दिया.
आखिर क्यों? सवाल उठता है कि सिर्फ 9 साल लगा देने भर से ‘ब्रह्मास्त्र’, के.आसिफ की कृति के बराबर हो जाती है? अमिताभ बच्चन, नागार्जुन और शाहरुख खान जैसे तमाम बेजोड़ कलाकारों के बावजूद ऐसा संभव क्यों नहीं हो सका. आयान मुखर्जी के पास शायद ही इसका जवाब हो. दरअसल, ‘ब्रह्मास्त्र’ के शुरुआती रिव्यू या दर्शकों की प्रतिक्रिया पर गौर करें तो उसी में आयान की असफलता की कहानी दिख जाती है. लोग फिल्म की शानदार प्रस्तुति की तारीफ करते हुए लचर कहानी पर कोफ्त करने लगते हैं. फिल्म के फाइव-स्टार रेटिंग वाले स्टारकास्ट के किसी डायलॉग को याद नहीं रख पाते हैं. वीएफएक्स की तारीफ करते हैं, तो माइथोलॉजी की उलट-पुलट पेशकश को सतही बताकर खारिज कर देते हैं. जाहिर है कि कोविड के बाद सिनेमाहॉल या मल्टीप्लेक्स में लौटने वाला दर्शक, जब चहेते स्टारकास्ट वाली फिल्म में इतनी सारी खामियां देखता है, तो उसे कोफ्त होती है. रिलीज से पहले ‘9 साल की मेहनत’ का दावा खोखला लगने लगता है.
के. आसिफ की कृति की याद
‘मुगल-ए-आजम’ जब बनी थी, तो बॉलीवुड के पास सीमित संसाधन, कमतर तकनीक और धन का अभाव था. बावजूद इसके आसिफ ने अपने सपने को पर्दे पर उतारने के लिए किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया. उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का एक गाने के लिए 25000 रुपए मेहनताना मांगने वाला किस्सा तो आपने पढ़ ही रखा होगा. शीशमहल वाले दृश्य के लिए भी, 60 के दशक में विदेशी तकनीशियनों को बुलवा लेना, किसी कमाल से कम नहीं है. यहां याद दिलाना जरूरी है कि ‘मुगल-ए-आजम’ का यह गाना फिल्म के ब्लैक एंड व्हाइट होते हुए भी पर्दे पर रंगीन दिखा था. जबकि पूरी तरह से रंगीन फिल्म की बात करें तो आपको राजकपूर की ‘संगम’ बताई जाएगी. इस अद्भुत फिल्म के स्पॉन्सर शापूरजी पलोनजी थे. मशहूर फिल्म इतिहासकार राजकुमार केसवानी ‘मुगल-ए-आजम’ के निर्माण पर लिखी अपनी किताब में बताते हैं कि शापूरजी पलोनजी ने आज तक मात्र एक ही फिल्म को स्पॉन्सर किया, जो के. आसिफ ने बनाई थी. यह के. आसिफ के ही बूते की बात थी कि भवन निर्माण के व्यवसाय से जुड़े शापूरजी पलोनजी को फिल्म निर्माण के लिए तैयार कर लिया.
के. आसिफ और ‘मुगल-ए-आजम’ से जुड़ी ऐसी कई यादगार बातें हैं, जो इस फिल्म के 9 साल में तैयार होने के पीछे की मेहनत को स्पष्ट करते हैं. इसलिए जब आयान मुखर्जी अपनी फिल्म के पीछे 9 साल की मेहनत बताते हैं, तो सवाल खड़ा होता है कि आपने इन वर्षों में किया क्या? हिंदी फिल्मों के दर्शक ऐसे कई दृश्य देख चुके हैं जिसमें लड़का विदेश से पढ़कर लौटा और देसी छोरी पर फिदा हो गया. विदेश से आई लड़की, देशी नायक का अपने लोगों का प्यार देखकर पिघल गई. ‘ब्रह्मास्त्र’ में यही दिखाना था, तो पौराणिकता का ढोल पीटने की क्या जरूरत थी. हमारे पुराण और धर्मग्रंथ, चमत्कारिक किस्सों से अटे पड़े हैं. ‘ब्रह्मास्त्र’ में शिवा को अग्निपुत्र बताने के लिए ऐसी ही किसी कथा का सहारा ले लेते? आयान मुखर्जी अपनी फिल्म के इन्हीं बिंदुओं पर पिट गए हैं. वे अच्छी फिल्म बना सकते थे. हॉलीवुड की तरह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को भी सुपरहीरो-टाइप सिनेमा की दिशा में ले जा सकते थे. मगर मुखर्जी चूक गए.
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FIRST PUBLISHED : September 12, 2022, 14:31 IST





