इन दिनों ‘बायरकतार टीबी 2 ड्रोन’ की बहुत चर्चा है. तुर्की के इस किलर ड्रोन ने युद्ध में यूक्रेन की बहुत मदद की है. मैदान-ए-जंग में एयर फोर्स की ताकत की अहमियत का इससे बेहतर और ताजा उदाहरण नहीं हो सकता. भारत भी अमेरिका से न सिर्फ एमक्यू-9 बी प्रीडेटर ड्रोन लेने वाला है बल्कि भारत भविष्य में इसका मैन्युफैक्चिरिंग का इरादा भी रखता है.
ड्रोन युद्ध के मैदान में आज के दौर का सबसे मारक और ताकतवर हथियार के रूप में सामने आया है. इससे पहले भारत फ्रांस से राफेल विमान लेकर अपनी हवाई ताकत को पहले ही मजबूत कर चुका है. वायुसेना की बात क्यों? क्योंकि 8 अक्टूबर को इंडियन एयर फोर्स डे है. पहली बार यूनाईटेड किंग्डम की रॉयल एयर फोर्स की सपोर्टिंग एयर फोर्स के रूप में 1932 में इसी दिन भारतीय एयर फोर्स कार्यरत हुई थी. युद्ध केंद्रित फिल्मों की बात करें तो एयर फोर्स हॉलीवुड का पसंदीदा विषय रहा है. बॉलीवुड में इस पर ज्यादा फिल्में नहीं बनी हैं. इन पर बात बाद में, शुरूआत एक किस्से से.
ये एक उलझी हुई कहानी है सो इसे समझने के लिए पहले इनके पात्रों को जान लेते हैं. तीन पॉयलट हैं वेन, कारा (फीमेल) और हैनरी. जिन्हें अमेरिकन नेवी के एक मिशन के लिए चार सौ पॉयलट्स में से सलेक्ट किया गया है. कैप्टेन जार्ज इस मिशन का ओवर ऑल हेड है. एक और फाईटर प्लेन इस बेड़े में शामिल होता है, चौथे सदस्य के रूप में. इसे हम ‘ईडी’ कहकर पुकारेंगे. ईडी के हाथ एक फाइल लगती है, जिसका शीर्षक है – ‘जान हथेली पर है.’ यह एक डेटा बेस सीक्रेट फाइल है. फाइल में दुश्मन देश के एक खतरनाक ठिकाने के बारे में जानकारी है. पढ़ने के बाद उसे लगता है कि दुश्मन के इस ठिकाने को तबाह करना जरूरी है.
ईडी यानि फाइटर प्लेन के पास इस समय सात मिसाइलें हैं. कम्प्यूटराइज्ड केलकुलेशन बताता है कि दुश्मन के ठिकाने को नेस्तनाबूद करने के लिए ये मिसाईलें काफी हैं. ईडी एक सफल मिशन को अंजाम देने के बाद वापस बेस पर लौट रहा है. नियम से उसे बेस पर लौटना चाहिए लेकिन वो ऐसा नहीं करता. कोई भी देशभक्त ईडी के इस कदम पर उसे शाबासी ही देगा, उसके जज्बे को सलाम करेगा. लेकिन ये सिक्के का एक पहलू है. सिक्के का दूसरा पहलू इसे रोचक कहानी में तब्दील कर देता है. जब ये पता चलता है कि ये फाइटर पायलट असल में पायलट है ही नहीं. बल्कि यह एक मानव रहित ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस इनेबल्ड फाइटर बाम्बर’ है, जो हाल ही में अमेरिकन नेवल विंग में शामिल किया गया है.
वो अपने पहले मिशन पर वेन, कारा और हैनरी के साथ निकला था. जहां उन्हें दुश्मन के परमाणु ठिकाने को नष्ट करना था. ईडी को इस मिशन में सिर्फ वेन के आदेशों का पालन करना था. टारगेट के पास पहुंच कर वेन को पता चलता है कि जहां परमाणु मिसाइल्स रखी गई हैं उस इलाके में आबादी भी है, जिससे बड़ी जनहानि हो सकती है. इसलिए वो परमाणु ठिकाने को नष्ट नहीं करने और लौटने का निर्णय लेता है. इस बारे में वो बैस पर मौजूद अपने बॉस कैप्टेन जार्ज को भी भरोसे में लेता है. लेकिन यहां ईडी उसका आदेश मानने से इंकार कर देता है. अपने को मिली कमांड की अवहेलना कर वो ठिकाने को तबाह कर देता है. जिससे बहुत सारे सिविलियंस और मासूम लोग भी मारे जाते हैं.
यही ईडी अब ‘जान हथेली पर है’ फाइल पढ़कर, बिना बॉस की परमिशन लिए नए दुश्मन के ठिकाने को तबाह करने के मिशन पर निकल पड़ा है. बेस पर मौजूद कैप्टन जार्ज ईडी के इस एक्शन से टेंशन में आ जाता है. क्योंकि एक तो फाइल में दिया गया ब्योरा पूरी तरह काल्पनिक है. दूसरा मानव रहित फाइटर बाम्बर – ईडी, जिस देश के अड्डे को तबाह करने निकला है वो अड्डा अमेरिका के सबसे खतरनाक और सनकी दुश्मन उत्तर कोरिया में स्थित है. वेन ईडी को समझाता है कि वो ये कदम नहीं उठाए और उनके साथ बेस पर वापस लौट चले. लेकिन ईडी नहीं मानता. अब वेन, कारा और हैनरी को ईडी को बेस पर वापस ले जाने के मुश्किल काम को अंजाम देना है, उत्तर कोरिया के ठिकाने पर हमला करने के पहले. अंत बहुत दिलचस्प और मिस्टीरियस है. सो इस बारे में बात नहीं करेंगे.
कहानी के यहां तक पहुंचते-पहुंचते जेहन में जो सबसे बड़ा सवाल उठता है, वो ये कि ईडी जो एक मानव निर्मित मशीन है, जिसकी प्रोग्रामिंग मनुष्य ने की है, वह अपने बॉस का कहना मानने से इंकार क्यों और कैसे कर सकती है. जवाब दिलचस्पी से भरा है. रोबोटिक फाइटर बॉम्बर यानि ईडी की प्रोग्रामिंग ‘आर्टिफिशिलय इंटेलीजेंस’ से लैस है. इसके चलते वो स्वत: निर्णय लेने में भी सक्षम है. ईडी जब अपनी ट्रेनिंग के दौरान वेन, कारा और हैनरी के साथ पहले मिशन पर गया था. तब वेन ने अपने बॉस जार्ज की कमांड को नहीं माना था और अपनी जान जोखिम में डालकर मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था और आतंकवादियों को मार गिराया था.
वेन ने उस समय पॉजीटिव एप्रोच और अच्छी भावना के साथ अपने बॉस का कहना नहीं माना था. क्योंकि उसे लग रहा था कि स्पॉट पर उसका निर्णय देश के लिए हितकारी है. इस घटना के समय ट्रेनिंग ले रही मानवरहित मशीन ने ये सीखा कि बॉस हमेशा सही नहीं होता और स्पॉट पर मौजूद सैनिक द्वारा लिए गए निर्णय ज्यादा सही होते हैं. इसलिए उसने आदेशों की अवहेलना करना शुरू कर दिया और इसे जारी भी रखा. ये कहानी है अमेरिकन मिलिट्री साइंस फिक्शन मूवी ‘स्टैल्थ’ की. 2005 में रिलीज़ हुई इस फिल्म का निर्देशन रॉब कोहेन ने किया था.
1982 में एक फिल्म आई थी ‘विजेता’. शशि कपूर द्वारा प्रोड्यूस इस फिल्म में उनके बेटे कुणाल कपूर ने सुंदर अभिनय किया था. गोविंद निहालानी द्वारा निर्देशित इस मूवी में रेखा भी थीं. इसके अलावा शाहिद कपूर और सोनम की फिल्म ‘मौसम’ यूं तो लव स्टोरी थी, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में वायुसेना थी. ‘हकीकत’ जैसी क्लासिक वार मूवी बनाने वाले चेतन आनंद ने भी इस विषय पर ‘हिंदुस्तान की कसम’ बनाई थी. ‘अग्निपंख’ तीन भारतीय वायुसेना के पायलटों की कहानी है जो एक मिशन पर पाकिस्तान जाते हैं. जहां उन्हें पकड़ लिया जाता है. ‘रंग दे बासंती’ की पृष्ठभूमि में ‘मिग 21 जेट विमान’ है.
‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ की कहानी पांच अध्यायों में विभक्त है. जो लोग भी एयर फोर्स में जाना चाहते हैं या एयर फोर्स उनकी पसंदीदा विंग है, तो उन्हें ‘विजेता’ जरूर देखना चाहिए. चुस्त कथानक वाली यह फिल्म बहुत इंटरेस्टिंग है. फिल्म में अमरीश पुरी ट्रेनर हैं. उनकी एक सोलोलॉकी (एकल संवाद) फिल्म के बारे में तो बताती ही है, एयर फोर्स की पूरी कहानी ही बयां कर देती है.
‘गलतफहमी की गु़ंजाइश मत रखना. नाईंटी नाईन परसेंट से काम नहीं चलेगा. एयरफोर्स में जि़ंदगी और मौत के बीच का अंतर इसी एक परसेंट का होता है. हंड्रेड परसेंट फिट हुए बिना इस ग्रूप में से कोई फाइटर पायलट नहीं बनेगा. ये एक सख्त प्रोफेशन है और इसकी डिमांड भी सख्त है. अभी सख्ती नहीं बरतूंगा, तो तुम्हारे खून से रंगेंगे मेरे हाथ. और मैं नहीं चाहता कि मेरे हाथ तुम्हारे खून से रंगें. मत भूलो फाइटर प्लेन पर करोड़ों रूपए खर्च करता है हमारा देश. तुम्हारी ट्रेनिंग पर भी करोड़ों खर्च होंगे. पर आज़ादी की कीमत नहीं आंकी जा सकती. यहां उन्हीं की ज़रूरत है जो सिर्फ जीतने में विश्वास रखते हैं. फाइटर पायलट बनने के लिए सेल्फ डिसिप्लिन चाहिए आधे सेकंड में डिसीजन लेने वाला चौकन्ना दिमाग चाहिए. इस ट्रेनिंग के बाद आप जो भी करेंगे दूसरों की नज़रों में चमत्कार होगा लेकिन आपके लिए सिर्फ रोजमर्रा का डिसिप्लिन.’
शकील खानफिल्म और कला समीक्षक
फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.
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